करणी माता छन्द Karni Mata Chhand

करणी माता छन्द Karni Mata Chhand

करणी माता छन्द Karni Mata Chhand

-:दोहा:-
चिंता विघन विनाशणी कमलासणी शकत्त।
वीसहथी हँस वाहणी; माता देहु सुमत्त !!१!!

-:छन्द भुजंगप्रयात :-
नमो आदि अन्नादि तूँही भवानी।
तुँही जोगमाया तुँही बाक बानी।
तुँही धर्णि आकाश वीभूँ पसारे।
तुँही मोह माया बिखे शूळ धारे॥1॥

तुँही चार वेदम् खटम् भाष चिन्ही।
तुँही ज्ञान वीज्ञान में सर्व भीनी।
तुँही वेद वीद्या चऊदे प्रकाशी।
कला मंड चोवीस की रूप राशि॥2॥

तुँही रागनी राग वेदम् पुराणम।
तुँही जंत्र में मंत्र में सर्व जाणम।
तुँही चन्द्र मे सूर्य मे ऐक भासै।
तुँही तेज में पुंज मै श्री प्रकासै॥3॥

तुँही सोखणी पोखणी तीन लोकम्।
तुँही जागणी सोवणी दूर दोखम्।
तुँही धर्मणी कर्मणी जोगमाया।
तुँही खेचरी भूचरी वज्रकाया ॥ 4॥

तुँही रिद्धि की सिद्धि की ऐक दाता।
तुँही जोगणी भोगणी हो विधाता।
तुँही चार खाँणी तुँही चार वाँणी।
तुँही आतमा पंच भूतम् प्रमाणी॥5॥

तुँही सात द्वीपम् नवे खंड मंडी।
तुँही घाट ओघाट ब्रह्मंड डंडी।
तुँही धर्णिआकाष तूँ वेद वाँनी !
तुँही नित्य नौजोवना हो भवानी॥6॥

तुँही उद्र में लोक तीनूँ उपावे।
तुँही छिन्न में खान पानी खपावे।
तुँही ऐक अन्नेक माया उपावे।
तुँही ब्रह्म भूतेष विष्णू कहावे॥7॥

तुँही मात हो ऐक ज्योती सरूपम्।
तुँही काल में काल माया विरूपम् !
तुँही हो ररंकार ऊँकार वाँणी।
तुँही स्थावरम् जंगमम् पोख प्राँणी॥8॥

तुँही तूँ तुँही तूँ तुँही ऐक चण्डी।
हरी शंकरी ब्रह्म भाखे अखण्डी।
तुँही कच्छ रूपम् उदद्धी बिलोही।
तुँही मोहिनी देव दैताँ विमोही॥9॥

तुँही देह वाराह देवी उपाई।
तुँही ले धरा थंभ डाढों उठाई।
तुँही विप्रहू में सुरापान टार्यो।
तुँही काल बाजी रची दैत मार्यो॥10॥

तुँही भारजा इंद्र को मान मार्यो।
तुँही जाय के भ्रग्गु को गर्व गार्यो।
तुँही काम कल्ला विखे प्रेम भीनी।
तुँही देव-दैत्यों दमी जीत दीनी॥11॥

तुँही जागती जोत निंद्रा न लेवे।
तुँही जीत देणी सदा देव सेवे।
अजोनी न जोनी उसासी न सासी।
न बैठी न ऊभी न पोढ़ी प्रकासी॥12

न जागे न सोवे न हाले न डोले।
गुपत्ती न छत्ती करंती किलोले।
भुजाळम् विशालम् उजाळम् भवानी।
कृपालम् त्रिकालम् करालम् दिवानी॥13॥

उदानम् अपानम् अछेही न छेही।
न माता न ताता न भ्राता सनेही।
विदेही न देही न रूपा न रेखी।
न माया न काया न छाया विषेखी॥14॥

उदासी न आसी निवासी न मंडी।
सरूपा विरूपा न रूपा सुँचंडी।
कमंखा न संखा असंखा कहाँणी !
हरींकार शब्दम् निरंकार बाँणी॥15॥

नवौढा न प्रौढा न मुग्धा न बाळी।
करोधा विरोधा निरोधा कृपाळी।
अभंगा न अंगा त्रिभंगा न जाँणी
अनंगा न अंगा सुरंगा पिछाँणी॥16॥

शिखा पै फुहारो असो रूप तोरो।
अजोनी सुँ पावों कटे फंद मोरो।
पढ़े चंद छन्दम् अभै दान पाऊँ।
निशा वासरं मात दुर्गे सुँ धाऊँ॥17॥

सुनी साध की टेर धाओ भवानी।
गजम् डूबते ही ब्रजम् राज जानी।
भजे खेचरी भूचरी भूत प्रेतम् !
भजे डाकिनी शाकिनी छोड़ खेतम्!!18॥

पढे जीत देनी सबै दैत नाशम्!
भजे किन्करी शन्करी काल पाशम्।
भजे त्रोटका जंत्र मन्त्रम् बिरोले।
भजे नारसिन्गी बली वीर डोले॥19॥

निशा वासरम् शक्ति को ध्यान धारे।
सुँ नैनम् करी नित्य दोषम् निवारे।
करी वीनती प्रेमसो भाट चंदम्
पढ़न्ते सुनन्ते मिटे काल फंदम्॥20॥

तुँही आद अन्नाद की ऐक माया।
सबे पिण्ड ब्रह्मांड तूँही उपाया।
तुँही वीर बावन्न वन्दे सुँ भारी।
तुँही वाहणी हंस देवी हमारी॥21

तुँही पंच तत्वम् धरी देह तारी।
तुँही गेह गेहम् भई शील वारी।
तुँही शैळजा श्री सावित्री सरूप्पी।
तुँही शिव्व विष्णू अजम् थीर थप्पी ॥22॥

तुँही पान कुम्भम् मधूपान कर्णी !
तुँही दुष्ट घातीन के प्राँण हर्णी।
तुँही जीव तूँ शिव्व तूँ रीत भर्णी !
तुँही अन्तरीखम् तुँही धीर धर्णी॥23॥

तुँही वेद में जीव रूपम् कहावे।
निराधार आधार सन्सार गावे।
तुँही त्रीगुणी तेज माया लुभाँणी।
तुँही पंच भूतम् नमस्ते भवानी ॥24॥

नमोकार रूपे कल्याँणी कमल्ळा।
कळारूप तूँ कामदा तूँ विमल्ळा !
कुमारी करूणा कमंखा कराळी।
जया विज्जया भद्रकाळी किंकाळी॥25॥

शिवा शंकरी विश्व वीमोह नीयम्।
वराही चमूंडा दुर्गा जोग नीयम् !
महालच्छमी मंगळा रत्त अख्खी।
महा तेज अंबार जालंद्र मख्खी॥26॥

तुँही गंग गोदावरी गोमतीयम्।
तुँही नर्मदा जम्मना सर्सतीयम्
तुँही कोटि सूरज्ज तेजम् प्रकाषी।
तुँही कोटि चन्दा ननम् जोत भाषी॥27॥

तुँही कोटिधा विश्व आकाश धारम्।
तुँही कोटि सूमेरु छाया अपारम् !
तुँही कोटि दावानळम् ज्वाळ माळा !
तुँही कोटि भैभीत रूपम् कराळा॥28॥

तुँही कोटि श्रृंगार लावण्यकारी।
तुँही राधिका रूप रीझे मुरारी।
तुँही विश्व कर्ता तुँही विश्व हर्ता।
तुँही स्थावरम जंगम् प्रवर्ता ॥29॥

द्रुगामां दुरीजन्न वन्दे न आयम्
जपे जाप जालन्धरी तो सहायम्।
नमस्ते नमस्ते सुँ जाळेन्द्र राँणी।
सुरम् आसुरम् नाग पूजन्त प्राँणी ॥30॥

नमोंकार रूपे सुँ आपे विराजे।
कळींकार ह्रींकार ऊँकार छाजे।
अहम्कार देवी सहम् कार भासम्!
श्रियम् कार हूँकार त्रींकार वासम्॥31॥

तुँही पातकाँ नाशणी नारसींगी।
तुँही जोगमाया अनेकों सुँरंगी।
तुँही तूँझ जाने सुँ तोरों चरीतम्
कहाँ मैं लिखों चंद तौरी सुँ क्रीतम्॥32॥

अपारम् अनन्तम् जुगम् रूप जानी।
नमस्ते नमस्ते नमस्ते भवानी।
नमो ज्वाळ ज्वाळामुखी तोहि धावे।
अभैही वरीदान को चंद पावे॥33॥

कहाँ लो बखाँणू लघू बुद्धि मेरी।
पतंगी कहा सूर सामे उजेरी।
रतीहैं तुमारी मती हैं तुमारी।
चितीहैं तुमारी गतीहैँ तुमारी॥34॥

जुगम् हाथ जोरी कहे चन्द छन्दम् !
हरो भक्त के दुःख आनन्द कन्दम्।
हिये में विराजो करो आप बानी।
नमस्ते नमस्ते नमस्ते भवानी॥35॥

-:दोहा:-
करी विनति यूँ वन्दिजन, सनमुख रहो सुजान।
प्रकट अम्बिका युँ कहयो, मांग चंद वरदान ॥1॥

-: छप्पय :-
जयति जयति जग मात,जयति कारण सब करणी।
जयति भरण भंडार,जयति तारण भवतरणी।
जयति बुध्धि गुरुदेव,दत्त वायक वरदाई।
जयति आद अन्नाद,पिण्ड ब्रहमांड उपाई।
अवलोक लोक साधित अखिल,करणी असुर वध काळिका।
रहो मोहि सहाय सब ठौर पर,जय जग चंडी ज्वाळिका॥1॥

आद अगम अवतार,दैत मैखासुर दरणी।
आद अगम अवतार,कैटभ मधु भच्छण करणी।
आद अगम अवतार,
रगत शिर रहै रग्गदर।
आदि अगम अवतार,
खळण दळ दळ्या खग्गधर।
सुर नर असुर साधंत नित,
करणी दुष्ट वध काळिका।
रहो मौ सहाय रणखेत में,जय जग चंडी ज्वाळिका॥2॥

शेषनाग साधंत,जपै उर आठौ जामहि।
अरक चंद्र उडुमाळ,
नित्त सुमिरै गुण ग्रामहि।
ब्रह्मा विष्णु महेश, सिध्ध चारण सुरराई।
अहरनिशा सुर असुर,
आपरी करत वडाई॥
ब्रह्मांड अखिल व्यापक शकति,
करणि हरणि प्रतिपाळिका।
कर जौरि चंद कवि उच्चरै,
जय जग चंडी ज्वाळिका॥3॥

-: दोहा :-
कवि चंद रण खेत मै जबहि लरन को जाय।
तब आराधै शक्ति को,
मंडै तत्व उपाय॥1॥

नागणी छंदः
रिध्धि दे, सिध्धि दे, अष्ट नव निध्धि दे, वंश मै वृद्धि दे ,बाकबानी।
ह्रदयमें ज्ञान दे, चित्तमें ध्यान दे, अभय वरदान दे, शंभुरानी दुःख को दुर कर,सुख भरपुर कर,आश संपुर कर दास जानी।
सज्जन सों हित दे,कुटुम्ब सो प्रीत दे

करणी माता छन्द

   जय मॉ खोड़ियार
   जय मॉ करणी 

   दोहा
तारण कुळ चारण तणो,उगारण तुं आइ।
मारण महिषासुर री,दुनिया पर दरसाइ॥1

 छंद दुरमिल
खळ जोर खळावण भै अळसावण,शर्ण उगारण तुं शगति।
हियमें हरखावण,अम्रत लावण,भाव उपावण तुं भगति।
मनरोग मटावण शोक शमावण जोग दिपावण तुं जबरी।
कुळतारण काज सुधारण कारण खोडल चारण देव खरी॥1

जळवाट अरु थळवाट जिवावण मांमडिया घर तुं जलमी।
कइ घाट अघाट उचाट घटावण अंग वैराट रुपां अनमी।
नृप पाट अरु रजवाट नभावण तुं समराट ह्रदे प्रसरी।
कुळतारण काज सुधारण कारण खोडल चारण देव खरी॥2

जयकार जमावण जंग जितावण अंग चढ़ावण शूर अति।
अनीति अळसावण रीत रखावण संप करावण दे सुमति।
विदवान बणावण बाळ भणावण भक्त बचावण प्रेम भरी।
कुळतारण काज सुधारण कारण खोडल चारण देव खरी॥3

दुरभिक्ष दुरावण मे वरसावण अन्न उपावण भूमि अति।
रिधि सिधि वधारण धीरज धारण वंश उधारण सत्य वृत्ति।
दरबार दिपावण मान अपावण वास वसावण ठांम ठरी।
कुळतारण काज सुधारण कारण खोडल चारण देव खरी॥4

सुखदायक सुंदर मंदिर छाजत राजत थानक राजपरे।
उरमै धर ध्यान उमंग अहोनिश कृष्ण महिपति सेव करे।
गुण” पिंगळ″गावत मात रीझावत धुन लगावत ध्यान धरी।
कुळतारण काज सुधारण कारण खोडल चारण देव खरी॥5।

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