माता चंद्रघंटा - पूजा विधि, भोग, आरती, मंत्र, कथा Mata Chandraghanta

M Prajapat
1
माता चंद्रघंटा Mata Chandraghanta
माता चंद्रघंटा Mata Chandraghanta

माता चंद्रघंटा Mata Chandraghanta : नवरात्रि के तीसरे दिन माता दुर्गा के तीसरे स्‍वरूप माता चंद्रघण्‍टा की पूजा होती है। मां का यह रूप अत्‍यंत तेजमयी और ममतामयी माना गया है। मां के मस्‍तक पर घंटे के आकार का मुकुट है इसलिए मां को चंद्रघण्‍टा नाम दिया गया। माता चंद्रघंटा को चंद्रखंड, चंडिका और रणचंडी के नाम से भी जाना जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है। इस दिन लाल वस्‍त्र पहनकर मां की पूजी करनी चाहिए।

इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रविष्ट होता है। लोकवेद के अनुसार माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

मां चंद्रघंटा की पूजा विधि (Maa Chandraghanta Puja Vidhi)

तृतीया तिथि के दिन सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर मां का ध्यान करें। जहां घटस्थापना की है, वहां साफ-सफाई करके माता चंद्रघटा की प्रतिमा को लाल या पीले कपड़े पर रख दें।
अब मां चंद्रघंटा को कुमकुम और अक्षत का तिलक लगाएं।
माता की तस्वीर के पास धूप दिखाकर मां की विधिवत पूजा करें। मां चंद्रघंटा को पीला रंग प्रिय है, अतः उन्हें पीले रंग के फूल और भोग अवश्य चढ़ाएं। पूजा के समापन के पहले देवी चंद्रघटा की आराधना मंत्रों का पाठ करें। उसके बाद आप दुर्गा सप्तशती का पाठ और चंद्रघंटा माता की आरती करें। इन मंत्रों का पाठ को करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं। भक्तों के दुखों को दूर करने के लिए माता ने अपने हाथों में त्रिशूल, तलवार और गदा रखा हुआ है।

मां चंद्रघंटा के लिए भोग (Maa Chandraghanta Bhog)

मां चंद्रघंटा देवी को दूध से बनी मिठाई और खीर अत्यधिक प्रिय है। अतः इस दिन, दूध से बनी चीजों का भोग लगाकर ब्राह्मणों को दान करें। इससे घर में सुख-समृद्धि आती है। 

मान्यता है कि दूध का भोग लगाने से माता प्रसन्न होती हैं और समृद्धि का आशीष देती हैं। 

मां चंद्रघंटा के मंत्र (Maa Chandraghanta Mantra)

उपासना मंत्र 
पिण्डजप्रवरारूढ़ा ण्डकोपास्त्रकेर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

महामंत्र
या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:।।
ये मां का महामंत्र है जिसे पूजा पाठ के दौरान जपना होता है। 

बीज मंत्र - ‘ऐं श्रीं शक्तयै नम:’

सरल मंत्र : ॐ एं ह्रीं क्लीं

ध्यान मंत्र 
वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम॥

मां चंद्रघंटा का स्तोत्र (Maa Chandraghanta Stotra) 

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्ति: शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

मां चंद्रघंटा का कवच (Maa Chandraghanta Kavach)  

रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥

मां चंद्रघंटा की आरती (Maa Chandraghanta Aarti)

जय मां चंद्रघंटा सुख धाम।
पूर्ण कीजो मेरे सभी काम।
चंद्र समान तुम शीतल दाती।
चंद्र तेज किरणों में समाती।

क्रोध को शांत करने वाली।
मीठे बोल सिखाने वाली।
मन की मालक मन भाती हो।
चंद्र घंटा तुम वरदाती हो।

सुंदर भाव को लाने वाली।
हर संकट मे बचाने वाली।
हर बुधवार जो तुझे ध्याये।
श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं।

मूर्ति चंद्र आकार बनाएं।
सन्मुख घी की ज्योत जलाएं।
शीश झुका कहे मन की बाता।
पूर्ण आस करो जगदाता।

कांची पुर स्थान तुम्हारा।
करनाटिका में मान तुम्हारा।
नाम तेरा रटू महारानी।
भक्त की रक्षा करो भवानी।

मां चंद्रघंटा की कथा (Maa Chandraghanta ki Katha)

पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां दुर्गा ने मां चंद्रघंटा का रूप तब धारण किया था जब दैत्यों का आतंक स्वर्ग पर बढ़ने लगा था। महिषासुर का आंतक और भयंकर युद्ध देवताओं से चल रहा था। क्योंकि महिषासुर देवराज इंद्र का सिंहासन प्राप्त करना चाहता था और स्वर्ग लोक पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता है।

जब देवताओं को इसका पता चला तो सभी परेशान हो गए और भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे।

त्रिदेवों ने देवताओं की बात सुनी और क्रोध प्रकट किया। कहा जाता है इसी क्रोध से त्रिदेवों के मुख से एक ऊर्जा निकली और उसी ऊर्जा से एक देवी अवतरित हुईं, जिनका नाम मां चंद्रघंटा है। उस देवी को भगवान शंकर ने अपना त्रिशूल, विष्णुजी ने अपना चक्र, इंद्र ने अपना घंटा, सूर्य ने अपना तेज और तलवार और सिंह प्रदान किया।

इसके बाद मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का वध कर देवताओं और स्वर्ग लोक की रक्षा की।

Image Source - Wikipedia - चंद्रघंटा

एक टिप्पणी भेजें

1टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!