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| गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र – भगवान विष्णु की स्तुति |
Gajendra Moksha Stotram Lyrics in Hindi
Gajendra Moksha Stotram Lyrics in Hindi – गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र भगवान विष्णु की स्तुति का एक प्रसिद्ध स्तोत्र है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध, तृतीय अध्याय में मिलता है। जब गजेन्द्र नामक हाथी मगरमच्छ के संकट में फंस गया और अपनी सारी शक्ति लगाने के बाद भी मुक्त नहीं हो सका, तब उसने पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ भगवान श्रीहरि का स्मरण किया।
गजेन्द्र की पुकार सुनकर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर वहां पहुंचे और गजेन्द्र को संकट से मुक्त किया। इसी प्रसंग से जुड़ी भगवान की स्तुति को गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र कहा जाता है।
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गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का महत्व
गजेन्द्र मोक्ष की कथा भक्त और भगवान के बीच पूर्ण समर्पण और विश्वास का सुंदर उदाहरण है। यह प्रसंग बताता है कि जब मनुष्य अपने सभी सांसारिक सहारों को छोड़कर सच्चे मन से परमात्मा की शरण लेता है, तब उसकी प्रार्थना में विशेष भाव उत्पन्न होता है।
नीचे श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ दिया गया है।
Gajendra Moksha Stotram Lyrics in Hindi
॥ श्रीशुक उवाच ॥
एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनोहृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥ १॥
॥ गजेन्द्र उवाच ॥
नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥ २॥
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।
योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥ ३॥
यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम् ।
अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः ॥ ४॥
कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।
तमस्तदाऽऽसीद्गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः ॥ ५॥
न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम् ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥ ६॥
दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं
विमुक्त सङ्गा मुनयः सुसाधवः ।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ॥ ७॥
न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा
न नामरूपे गुणदोष एव वा ।
तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः
स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥ ८॥
तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥ ९॥
नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥ १०॥
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥ ११॥
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥ १२॥
क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥ १३॥
सर्वेन्द्रियगुणदृष्टे सर्व प्रत्यय हेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥ १४॥
नमो नमस्तेऽखिलकारणाय
निष्कारणायाद्भुतकारणाय ।
सर्वागमाम्नायमहार्णवाय
नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥ १५॥
गुणारणिच्छन्नचिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥ १६॥
मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥ १७॥
आत्माऽऽत्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय ।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥ १८॥
यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥ १९॥
एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं
वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं
गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ॥ २०॥
तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥ २१॥
यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥ २२॥
यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत्स्वरोचिषः ।
तथा यतोऽयं गुणसम्प्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥ २३॥
स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ्
न स्त्री न षण्डो न पुमान्न जन्तुः ।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन्
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥ २४॥
जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् ॥ २५॥
सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम् ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥ २६॥
योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ॥ २७॥
नमो नमस्तुभ्यमसह्य वेग-
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥ २८॥
नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहन्धिया हतम् ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम् ॥ २९॥
॥ श्रीशुक उवाच ॥
एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिङ्गभिदाभिमानाः ।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात्
तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥ ३०॥
तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवभिः ।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान-
श्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥ ३१॥
सोऽन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम् ।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा-
न्नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते ॥ ३२॥
तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।
ग्राहाद्विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम् ॥ ३३॥
- श्री गजेन्द्र कृत भगवान का स्तवन
गजेन्द्र मोक्ष की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार गजेन्द्र हाथियों का राजा था। एक दिन वह अपने साथियों के साथ एक सुंदर सरोवर में गया। वहां जल में प्रवेश करने के बाद एक ग्राह ने उसके पैर को पकड़ लिया। गजेन्द्र ने स्वयं को बचाने के लिए बहुत प्रयास किया, लेकिन संघर्ष लंबा होता गया।
जब गजेन्द्र को अपनी शक्ति पर भरोसा नहीं रहा, तब उसने भगवान की शरण ग्रहण की और परमात्मा की स्तुति की। उसकी पुकार सुनकर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर वहां पहुंचे। भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से ग्राह का वध किया और गजेन्द्र को संकट से मुक्त किया।
यह प्रसंग पूर्ण शरणागति, विश्वास और भगवान के प्रति भक्ति का सुंदर संदेश देता है।
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गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ कब करें?
गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ श्रद्धा और शांत मन से किया जा सकता है। बहुत से भक्त इसे भगवान विष्णु की पूजा, एकादशी, विशेष धार्मिक अवसरों या संकट के समय भगवान के स्मरण के रूप में पढ़ते हैं।
पाठ करते समय शब्दों के सही उच्चारण और भाव पर ध्यान देना अच्छा माना जाता है। यदि संपूर्ण संस्कृत पाठ कठिन लगे, तो पहले इसका अर्थ समझकर धीरे-धीरे पाठ का अभ्यास किया जा सकता है।
गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का संदेश
गजेन्द्र मोक्ष की कथा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि केवल बाहरी शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय मनुष्य को परमात्मा के प्रति विश्वास और समर्पण रखना चाहिए। कठिन परिस्थिति में भी भगवान का स्मरण मन को साहस और आशा देता है।
Gajendra Moksha Stotram – FAQ
गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र किस भगवान को समर्पित है?
गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र भगवान विष्णु, अर्थात श्रीहरि की स्तुति है। गजेन्द्र संकट में भगवान की शरण लेकर उनकी आराधना करता है।
गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र कहां वर्णित है?
गजेन्द्र मोक्ष का प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध के तृतीय अध्याय में वर्णित है।
गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
गजेन्द्र की स्तुति सहित इस अध्याय में गजेन्द्र मोक्ष से संबंधित 33 श्लोकों का पाठ मिलता है।
गजेन्द्र मोक्ष का पाठ क्यों किया जाता है?
भक्त इसे भगवान विष्णु के स्मरण, भक्ति और शरणागति के भाव से पढ़ते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह स्तोत्र संकट के समय भगवान की शरण लेने की प्रेरणा देता है।
गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इसे अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार सुबह पूजा के समय या किसी शांत समय में पढ़ा जा सकता है। विशेष धार्मिक दिनों पर भी भक्त इसका पाठ करते हैं।
समापन
गजेन्द्र मोक्ष केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच विश्वास और समर्पण की प्रेरणादायक कथा है। गजेन्द्र ने जब अपने सभी प्रयासों के बाद श्रीहरि को पुकारा, तब भगवान विष्णु उसकी सहायता के लिए प्रकट हुए। यही कारण है कि गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र आज भी भगवान विष्णु के भक्तों के बीच श्रद्धा से पढ़ा जाता है।
भगवान श्रीहरि विष्णु सभी भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखें और सभी के जीवन में सुख, शांति और सद्बुद्धि प्रदान करें।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। 🙏


