त्रिपुरासुन्दरी (Tripura Sundari)

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मां त्रिपुरासुन्दरी केंद्र में विराजमान, चारों हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण, दोनों ओर दस महाविद्याएँ
मां त्रिपुरासुन्दरी - आदिशक्ति का सर्वोत्तम स्वरूप, धन, ऐश्वर्य, भोग और मोक्ष की अधिष्ठात्री देवी।

त्रिपुरासुन्दरी (Tripura Sundari)

त्रिपुरासुन्दरी दस महाविद्याओं (दस देवियों) में से सबसे प्रमुख देवी हैं। त्रिपुरासुन्दरी आदिशक्ति का सर्वोत्तम स्वरूप, मणिद्वीप की महारानी, यह देवी त्रिगुणात्मिका का तांत्रिक स्वरूप है। त्रिपुरासुन्दरी को 'महात्रिपुरसुन्दरी', षोडशी, ललिता, लीलावती, लीलामती, ललिताम्बिका, लीलेशी, लीलेश्वरी, ललितागौरी, पद्माक्षी रेणुका तथा राजराजेश्वरी भी कहते हैं। त्रिपुरसुन्दरी के चारों हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण सुशोभित हैं।

चार दिशाओं में चार और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें तंत्र शास्त्रों में ‘पंचवक्त्र’ अर्थात् पांच मुखों वाली कहा गया है। आप सोलह कलाओं से परिपूर्ण हैं, इसलिए इनका नाम ‘षोडशी’ भी है। भैरवयामल और शक्तिलहरी में त्रिपुर सुन्दरी उपासना का विस्तृत वर्णन मिलता है। त्रिपुर सुंदरी धन, ऐश्वर्य, भोग और मोक्ष की अधिष्ठात्री देवी हैं। त्रिपुरासुन्दरी, काली का रक्तवर्णा रूप हैं। तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार महात्रिपुरसुन्दरी भगवती आद्यशक्ति का ही परात्पर स्वरूप हैं। काली के दो रूप कृष्णवर्णा और रक्तवर्णा हैं।


ऋषि दुर्वासा आपके परम आराधक थे। इनकी उपासना श्री चक्र में होती है। आदिगुरू शंकरचार्य ने भी अपने ग्रन्थ सौन्दर्यलहरी में त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या की बड़ी सरस स्तुति की है। कहा जाता है- भगवती त्रिपुर सुन्दरी के आशीर्वाद से साधक को भोग और मोक्ष दोनों सहज उपलब्ध हो जाते हैं।

इस विद्या के तीन रूप हैं -

  1. आठ वर्षीय (8 वर्ष): बालिका, बाला, त्रिपुर सुंदरी
  2. षोडष वर्षीय (16 वर्ष): षोडषी, श्री पद्माक्षी रेणुका
  3. युवा स्वरूप, ललिता, त्रिपुरसुन्दरी, (साधना में इनके क्रम और गुरु के मार्गदर्शन का ध्यान रखना आवश्यक माना गया है।)
त्रिपुरसुन्दरी की साधना में इनके तीनों रूपों के क्रम का ध्यान रखना आवश्यक है। जिन्होंने सीधे ललिता त्रिपुरसुन्दरी की उपासना की उन्हें शुरू में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

अस्त्र - पाश, अंकुश, धनुष और बाण
जीवनसाथी - कामेश्वर
संतान - अशोक सुंदरी
सवारी - सिंहासन
त्यौहार - ललिता पंचमी, नवरात्रि, गुप्त नवरात्रि

श्री ब्रह्माण्ड पुराण के अंतर्गत ललितोपाख्यान में ही यह स्पष्ट है कि मां त्रिपुर सुंदरी का विवाह परम भगवान कामेश्वर के साथ हुआ था जो भगवान सदाशिव के सगुण स्वरूप हैं।

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